श्रीमद्‌-भगवन्नेमिचन्द्र-प्रणीत श्री द्रव्यसंग्रह - मूलपाठ


श्रीमद्‌-भगवन्नेमिचन्द्र-प्रणीत

श्री द्रव्यसंग्रह

ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नम: ॥1॥

अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका
मुनिभिरूपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ॥2॥

अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥3॥

॥ श्रीपरमगुरुवे नम:, परम्पराचार्यगुरुवे नम: ॥

सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमन: प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्री-द्रव्यसंग्रह नामधेयं, अस्य मूल-ग्रन्थकर्तार: श्री-सर्वज्ञ-देवास्तदुत्तर-ग्रन्थ-कर्तार: श्री-गणधर-देवा: प्रति-गणधर-देवास्तेषां वचनानुसार-मासाद्य आचार्य श्री-नेमिचंद्र-देव विरचितं ॥

॥ श्रोतार: सावधानतया शृणवन्तु ॥

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्‌ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्‌ ॥


मंगलाचरण

जीवमजीवं दव्वं, जिणवरवसहेण जेण णिद्दिट्ठं
देविंदविंदवंदं, वंदे तं सव्वदा सिरसा ॥1॥

कहे जीव अजीव जिन जिनवरवृषभ ने लोक में ।
वे वंद्य सुरपति वृन्द से बंदन करूं कर जोर मैं ॥१॥



जीवो उवओगमओ, अमुत्तिकत्ता सदेहपरिमाणो
भोत्ता संसारत्थो, सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥2॥

जीव कर्ता भोक्ता अर अमूर्तिक उपयोगमय ।
अर सिद्ध भवगत देहमित निजभाव से ही ऊर्ध्वगत ॥२॥



तिक्काले चदुपाणा, इंदिय बलमाउ आणपाणो य
ववहारा सो जीवो, णिच्चयणयदोदु चेदणाजस्स ॥3॥

जो सदा धारें श्वास इन्द्रिय आयु बल व्यवहार से ।
वे जीव निश्चय जीव वे जिनके रहे नित चेतना ॥३॥



उवओगो दुवियप्पो, दंसण णाणं च दंसणं चदुधा
चक्खु अचक्खू ओही, दंसणमध केवलं णेयं ॥4॥

उपयोग दो हैं ज्ञान-दर्शन चार दर्शन जानिये ।
चक्षु चक्षु अवधि केवल नाम से पहिचानिये ॥४॥



णाणं अट्ठवियप्पं, मदिसुदओही अणाणणाणाणी
मणपज्जयकेवलमवि, पच्चक्ख परोक्खभेयं च ॥5॥

ज्ञान आठ मतिश्रुतावधि ज्ञान भी कुज्ञान भी ।
मन:पर्यय और केवल प्रत्यक्ष और परोक्ष भी ॥५॥



अट्ठचदुणाण दंसण, सामण्णं जीवलक्खणं भणियं
ववहारा सुद्धणया, सुद्धं पुण दंसणं णाणं ॥6॥

सामान्यतः चऊ-आठ दर्शन-ज्ञान जिय लक्षण कहे ।
व्यवहार से पर शुद्धनय से शुद्धदर्शन-ज्ञान हैं ॥६॥



वण्ण रस पंच गंधा, दो फासा अट्ठणिच्चया जीवे
णो संति अमुत्ति तदो, ववहारा मुत्ति बंधादो ॥7॥

स्पर्श रस गंध वर्ण जिय में नहीं हैं परमार्थ से ।
अत: जीव अमूर्त मूर्तिक बंध से व्यवहार से ॥७॥



पुग्गलकम्मादीणं, कत्ता ववहारदो दु णिच्चयदो
चेदणकम्माणादा, सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥8॥

चिद्कर्म कर्ता नियत से द्रव कर्म का व्यवहार से ।
शुधभाव का कर्ता कहा है आत्मा परमार्थ से ॥८॥



ववहारा सुहदुक्खं, पुग्गलकम्मप्फलं पभुंजेदि
आदा णिच्चयणयदो, चेदणभावं खु आदस्स ॥9॥

कर्मफल सुख-दुक्ख भोगे जीव नय व्यवहार से ।
किन्तु चेतनभाव को भोगे सदा परमार्थ से ॥९॥



अणुगुरुदेह-पमाणो, उवसंहारप्पसप्पदो चेदा
असमुहदो ववहारा, णिच्चयणयदोअसंखदेसो वा ॥10॥

समुद्घात विन तनमापमय संकोच से विस्तार से ।
व्यवहार से यह जीव असंख्य प्रदेशमय परमार्थ से ॥१०॥



पुढविजलतेउवाऊ, वणप्फदी विविहथावरेइंदी
विगतिगचदुपंचक्खा, तसजीवा होंति संखादी ॥11॥

भूजलानलवनस्पति अर वायु थावर जीव हैं ।
दो इन्द्रियों से पाँच तक शंखादि सब त्रस जीव हैं ॥११॥



समणा अमणा णेया, पंचिंदिय णिम्मणा परे सव्वे
बादरसुहुमेइंदी, सव्वे पज्जत्त इदरा य ॥12॥

पंचेन्द्रियी संज्ञी-असंज्ञी शेष सब असंज्ञि ही हैं ।
एकेन्द्रियी हैं सूक्ष्म-बादर पर्याप्तकेतर सभी हैं ॥१२॥



मग्गणगुणठाणेहिंय, चउदसहिंह-वंतितहअसुद्धणया
विण्णेया संसारी, सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया ॥13॥

भवलीन जिय विध चतुर्दश गुणस्थान मार्गणथान से ।
अशुद्धनय से कहे है पर शुद्धनय से शुद्ध हैं ॥१३॥



णिक्कम्मा अट्ठगुणा,किंचूणा चरमदेहदो सिद्धा
लोयग्गठिदा णिच्चा, उप्पादवयेहिं संजुत्ता ॥14॥

उत्पादव्ययसंयुक्त अन्तिम देह से कुछ न्यून हैं ।
लोकाग्रथित निष्कर्म शाश्वत अष्टगुणमय सिद्ध हैं ॥१४॥



अज्जीवो पुणणेओ, पुग्गल धम्मो अधम्म आयासं
कालो पुग्गल मुत्तो, रूवादिगुणो अमुत्ति सेसादु ॥15॥

मूर्त पुद्गल किन्तु धर्माधर्म नभ अर काल भी ।
मूर्तिक नहीं है तथापि ये सभी द्रव्य अजीव हैं ॥१५॥



सद्दो बंधो सुहुमो, थूलो संठाणभेदतमछाया
उज्जोदादवसहिया, पुग्गल दव्वस्स पज्जाया ॥16॥

थूल सूक्षम बंध तम संस्थान आतप भेद अर ।
उद्योत छाया शब्द पुद्गल द्रव्य के परिणाम हैं ॥१६॥



गइपरिणयाण धम्मो, पुग्गलजीवाण गमणसहयारी
तोयं जह मच्छाणं, अच्छंता णेव सो णेई ॥17॥

स्वयं चलती मीन को जल निमित्त होता जिसतरह ।
चलते हुए जिय-पुद्गलों को धरमदरव उसीतरह ॥१७॥



ठाणजुदाण अधम्मो, पुग्गलजीवाण ठाणसहयारी
छाया जह पहियाणं, गच्छंता णेव सो धरई ॥18॥

छाया निमित्त ज्यों गमनपूर्वक स्वयं ठहरे पथिक को ।
अधरम त्यों ठहरने में निमित्त पुद्गल-जीव को ॥१८॥



अवगासदाण जोग्गं, जीवादीणं वियाण आयासं
जेण्हं लोगागासं, अल्लोगागासमिदि दुविहं ॥19॥

आकाश वह जीवादि को अवकाश देने योग्य जो ।
आकाश के दो भेद हैं जो लोक और अलोक हैं ॥१९॥



धम्माधम्मा कालो, पुग्गलजीवा य संति जावदिये
आयासे सो लोगो, तत्तो परदो अलोगुत्तो ॥20॥

काल धर्माधर्म जीव पुद्गल रहें जिस क्षेत्र में ।
वह क्षेत्र ही बस लोक है अवशेष क्षेत्र अलोक है ॥२०॥



दव्वपरिवट्टरूवो, जो सो कालो हवेइ ववहारो
परिणामादीलक्खो, वट्टणलक्खो व परमट्ठो ॥21॥

परिवर्तन रूप परिणामादि लक्षित काल जो ।
व्यवहार वह परमार्थ तो बस वर्तनामय जानिये ॥२१॥



लोयायासपदेसे, इक्केक्के जे ठिया हु इक्केक्का
रयणाणं रासीमिव, ते कालाणू असंखदव्वाणि ॥22॥

जानलो इस लोक को जो एक-एक प्रदेश पर ।
रत्नराशिवत् जड़े वे असंख्य कालाणु दरब ॥२२॥



एवं छब्भेयमिदं, जीवाजीवप्पभेददो दव्वं
उत्तं कालविजुत्तं, णायव्वा पंच अत्थिकाया दु ॥23॥

इसतरह ये छह दरब जो जीव और अजीवमय ।
कालबिन बाकी दरब ही पंच अस्तिकाय हैं ॥२३॥



संति जदो तेणेदे, अत्थीति भणंति जिणवरा जम्हा
काया इव बहुदेसा, तम्हा काया या अत्थिकाया य ॥24॥

कायवत बहुप्रदेशी हैं इसलिए तो काय है ।
अस्तित्वमय हैं इसलिए अस्ति कहा जिनदेव ने ॥२४ ॥



होति असंखा जीवे, धम्माधम्मे अणंत आयासे
मुत्ते तिविह पदेसा, कालस्सेगोणतेण सो काओ ॥25॥

हैं अनंत प्रदेश नभ जिय धर्म अधर्म असंख्य हैं ।
सब पुद्गलों के त्रिविध एवं काल का बस एक है ॥२५॥



एयपदेसो वि अणू, णाणाखंधप्पदेसदो होदि
बहुदेसो उवयारा, तेण य काओ भणंति सव्वण्हू ॥26॥

यद्यपि पुद्गल अणु है मात्र एक प्रदेशमय ।
पर बहुप्रदेशी कहें जिन स्कन्ध के उपचार से ॥२६॥



जावदियं आयासं, अविभागी पुग्गलाणु वट्ठद्धं
तं खु पदेसं जाणे, सव्वाणुट्ठाणदाणरिहं ॥27॥

एक अणु जितनी जगह घेरे प्रदेश कहें उसे ।
किन्तु एक प्रदेश में ही अनेक परमाणु रहें ॥२७॥



आसव बंधणसंवर-णिज्जरमोक्खा सपुण्णपावा जे
जीवाजीव-विसेसा, तेवि समासेण पभणामो ॥28॥

बंध आस्रव पुण्य-पापरु मोक्ष संवर निर्जरा ।
विशेष जीव अजीव के संक्षेप में उनको कहें ॥२८॥




आसवदि जेण कम्मं, परिणामेणप्पणो स विण्णेयो
भावासवो जिणुत्तो, कम्मासवणं परो होदि ॥29॥

कर्म आना द्रव्य आस्रव जीव के जिस भाव से ।
हो कर्म आस्रव भाव वे ही भाव आस्रव जानिये ॥२९॥



मिच्छत्ताविरदिपमाद - जोगकोहादओथ विण्णेया
पण पण पण दह तिय चदु, कमसो भेदा दु पुव्वस्स ॥30॥

मिथ्यात्व-अविरति पाँच-पाँचरू पंचदश परमाद हैं ।
त्रय योग चार कषाय ये सब आस्रवों के भेद हैं ॥३०॥



णाणावरणादीणं, जोग्गं जं पुग्गलं समासवदि
दव्वासवो च णेओ, अणेयभेयो जिणक्खादो ॥31॥

ज्ञानावरण आदिक करम के योग्य पुद्गल आगमन ।
है द्रव्य आस्रव विविधविध जो कहा जिनवर देव ने ॥३१॥



बज्झदि कम्मं जेण दु, चेदणभावेण भावबंधो सो
कम्मदपदेसाणं अण्णोण्णपवेसणं इदरो ॥32॥

जिस भाव से हो कर्मबंधन भावबंध है भाव वह ।
द्रवबंध बंधन प्रदेशों का आत्मा अर कर्म के ॥३२॥



पयडिट्ठिदिअणुभाग-प्पदेसभेदा दु चदुविधो बंधो
जोगा पयडिपदेसा, ठिदि अणुभागा कसायदो होंति ॥33॥

बंध चार प्रकार प्रकृति प्रदेश थिती अनुभाग ये ।
योग से प्रकृति प्रदेश अनुभाग थिती कषाय से ॥३३॥



चेदणपरिणामो जो, कम्मस्सासवणिरोहणे हेऊ
सो भावसंवरो खलु, दव्वासवरोहणे अण्णो ॥34॥

कर्म रुकना द्रव्य संवर और उसके हेतु जो ।
निज आत्मा के भाव वे ही भाव संवर जानिये ॥३४॥



वदसमिदी गुत्तीओ, धम्माणुपिहा परीसहजओ य
चारित्तं बहुभेयं, णायव्वा भावसंवरविसेसा ॥35॥

व्रत समिति गुप्ती धर्म परिषहजय तथा अनुप्रेक्षा ।
चारित्र भेद अनेक वे सब भावसंवररूप है ॥३५॥



जह कालेण तवेण य, भुत्तरसं कम्मपुग्गलं जेण
भावेण सडदि णेया, तस्सडणं चेदि णिज्जरा दुविहा ॥36॥

द्रव निर्जरा है कर्म झरना और उसके हेतु जो ।
तपरूप निर्मल भाव वे ही भावनिर्जर जानिये ॥३६॥



सव्वस्स कम्मणो जो, खयहेदू अप्पणो हु परिणामो
णेओ स भावमोक्खो, दव्वविमोक्खो य कम्मपुधभावो ॥37॥

भावमुक्ती कर्मक्षय के हेतु निर्मलभाव हैं ।
अर द्रव्यमुक्ती कर्मरज से मुक्त होना जानिये ॥३७ ॥




सुह असुह भावजुत्ता, पुण्णं पावं हवंति खलु जीवा
सादं सुहउणाणं, गोदं पुण्णं पराणि पावं च ॥38॥

शुभाशुभ परिणामयुत जिय पुण-पाप सातावेदनी ।
शुभ आयु नामरु गोत्र पुण अवशेष तो सब पाप है ॥३८॥



सम्मद्दंसण णाणं, चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे
ववहारा णिच्चयदो, तत्तियमइयो णिओअप्पा ॥39॥

सम्यग्दरशसद्ज्ञानचारित्र मुक्तिमग व्यवहार से ।
इन तीन मय शुद्धातमा है मुक्तिमग परमार्थ से ॥३९॥



रयणत्तयं ण वट्टइ, अप्पाणं मुयत्तु अण्णदवियम्हि
तम्हा तत्तियमइयो, होदि हु मोक्खस्स कारणं आदा ॥40॥

आत्मा से भिन्न द्रव्यों में रहें न रत्नत्रय ।
बस इसलिए ही रतनत्रयमय आतमा ही मुक्तिमग ॥४०॥



जीवादीसद्दहणं, सम्मत्तं रूवमप्पणो तं तु
दुरभिणिवेसविमुक्कं, णाणं सम्मं खु होदि सदि जम्हि ॥41॥

जीवादि का श्रद्धान समकित जो कि आत्मस्वरूप है ।
और दुरभिनिवेश विरहित ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ॥४१॥



संसयविमोह विब्भम, विवज्जियं अप्पपरसरूवस्स
गहणं सम्मं णाणं; सायार-मणेयभेयं तु ॥42॥

संशयविमोहविभरमविरहित स्वपर को जो जानता ।
साकार सम्यग्ज्ञान है वह है अनेकप्रकार का ॥४२॥



जं सामण्णं गहणं, भावाणं णेव कट्टुमायारं
अविसेसदूण अट्ठे, दंसणमिदि भण्णए समये ॥43॥

अर्थग्राहक निर्विकल्पक और है अविशेष जो ।
सामान्य अवलोकन करे जो उसे दर्शन जानना ॥४३॥



दंसणपुव्वं णाणं, छदमत्थाणं ण दोण्णि उवउग्गा
जुगवं जम्हा केवलि-णाहे जुगवं तु ते दो वि ॥44॥

जिनवर कहें छद्मस्थ के हो ज्ञान दर्शनपूर्वक ।
पर केवली के साथ हो दोनों सदा यह जानिये ॥४४॥



असुहादो विणिवित्ती, सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं
वदसमिदिगुत्तिरूवं, ववहारणया दु जिणभणियं ॥45॥

अशुभ से विनिवृत्त हो व्रत समितिगुप्तिरूप में ।
शुभभावमय हो प्रवृत्ती व्यवहारचारित्र जिन कहें ॥४५॥



बहिरब्भंतरकिरिया-रोहो भवकारणप्पणासट्ठं
णाणिस्स जं जिणुत्तं, तं परमं सम्मचारित्तं ॥46॥

बाह्य अंतर क्रिया के अवरोध से जो भाव हों ।
संसारनाशक भाव वे परमार्थ चारित्र जानिये ॥४६॥



दुविहं पि मोक्खहेउं, झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा
तम्हा पयत्तचित्ता, जूयं झाणं समब्भसह ॥47॥

अरे दोनों मुक्तिमग बस ध्यान में ही प्राप्त हो ।
इसलिए चित्तप्रसन्न से नित करो ध्यानाभ्यास तुम ॥४७॥



मा मुज्झह मा रज्जह, मा दुस्सह इट्ठणिट्ठअत्थेसु
थिरमिच्छह जइ चित्तं, विचित्तझाणप्पसिद्धीए ॥48॥

यदि कामना है निर्विकल्पक ध्यान में हो चित्त थिर ।
तो मोह-राग-द्वेष इष्टानिष्ट में तुम ना करो ॥४८॥



पणतीस सोल छप्पण, चदुदुगमेगं च जबह झाएह
परमेट्ठिवाचयाणं, अण्णं च गुरूवएसेण ॥49॥

परमेष्ठीवाचक एक दो छह चार सोलह पाँच अर ।
पैंतीस अक्षर जपो नित अर अन्य गुरु उपदेश से ॥४९॥



णट्ठचदुघाइकम्मो, दंसणसुहणाणवीरियमइयो
सुहदेहत्थो अप्पा, सुद्धो अरिहो विचिंतिज्जो ॥50॥

नाशकर चऊ घाति दर्शन ज्ञान सुख अर वीर्यमय ।
शुभदेहथित अरिहंत जिन का नित्यप्रति चिन्तन करो ॥५०॥



णट्ठट्ठकम्मदेहो, लोयालोयस्स जाणओ दट्ठा
पुरुसायारो अप्पा, सिद्धो झाएह लोय सिहरत्थो ॥51॥

लोकाग्रथित निर्देह लोकालोक ज्ञायक आत्मा ।
आठ कर्म नाशक सिद्ध प्रभु का ध्यान तुम नित ही करो ॥५१॥



दंसणणाणपहाणे, वीरियचारित्त-वरतवायारे
अप्पं परं च जुंजइ, सो आइरियो मुणी झेओ ॥52॥

ज्ञान-दर्शन-वीर्य-तप एवं चरित्राचार में ।
जो जोड़ते हैं स्वपर को ध्यावो उन्हीं आचार्य को ॥५२॥



जो रयणत्तयजुत्तो, णिच्चं धम्मोवएसणे णिरदो
सो उवझाओ अप्पा, जदिवरवसहो णमो तस्स ॥53॥

रत्नत्रय युत नित निरत जो धर्म के उपदेश में ।
सब साधु जन में श्रेष्ठ श्री उवझाय को वंदन करें ॥५३॥



दंसणणाण समग्गं, मग्गं मोक्खस्स जो हु चारित्तं
साधयदि णिच्चसुद्धं, साहू सो मुणी णमो तस्स ॥54॥

जो ज्ञान-दर्शनपूर्वक चारित्र की आराधना ।
कर मोक्षमारग में खड़े उन साधुओं को है नमन ॥५४॥



जं किंचिवि चिंतंतो, णिरीहवित्ती हवे जदा साहू
लद्धूणय एयत्तं, तदा हु तं तस्स णिच्चयं झाणं ॥55॥

निजध्येय में एकत्व निष्पृहवृत्ति धारक साधुजन ।
चिन्तन करें जिस किसी का भी सभी निश्चय ध्यान है॥५५॥



मा चिठ्ठह माजंपह, मा चिंतह विंवि जेण होइ थिरो
अप्पा अप्पम्मि रओ, इणमेव परं हवे झाणं ॥56॥

बोलो नहीं सोचो नहीं अर चेष्टा भी मत करो ।
उत्कृष्टतम यह ध्यान है निज आतमा में रत रहो ॥५६॥



तवसुदवदवं चेदा, झाणरह-धुरंधरो हवे जम्हा
तम्हा तत्तियणिरदा, तल्लद्धीए सदा होई ॥57॥

व्रती तपसी श्रुताभ्यासी ध्यान में हो धुरंधर ।
निज ध्यान करने के लिए तुम करो इनकी साधना ॥५७॥



दव्वसंगहमिणं मुणिणाहा, दोससंचयचुदा सुदपुण्णा
सोधयंतु तणुसुत्तधरेण, णेमिचंदमुणिणा भणियं जं ॥58॥

अल्प श्रुतधर नेमिचंद मुनि द्रव्यसंग्रह संग्रही ।
अब दोषविरहित पूर्णश्रुतधर साधु संशोधन करें ॥५८॥


समाप्त 



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