उवासंग्गाहरम स्तोत्र - करुणाकर आचार्य भद्रबाहु के संघ द्वारा रचित
उवासंग्गाहरम स्तोत्र उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्म-घण मुक्कं । विसहर विस णिण्णासं, मंगल कल्लाण आवासं ।।१।। अर्थ: प्रगाढ कर्म समूह से सर्वथा मुक्त, विषधरो के विष को नाश करने वाले, मंगल और कल्याण के आवास तथा उपसर्गों को हरने वाले भगवन पार्श्वनाथ के में वंदना करता हूँ । विसहर फुलिंगमंतं, कंठे धारेदि जो सया मणुवो । तस्स गह रोग मारी, दुट्ठ जरा जंति उवसामं ।।२।। अर्थ: विष को हरने वाले इस मन्त्ररुपी स्फुलिंग को जो मनुष्य सदेव अपने कंठ में धारण करता है, उस व्यक्ति के दुष्ट ग्रह, रोग बीमारी, दुष्ट, शत्रु एवं बुढापे के दुःख शांत हो जाते है । चिट्ठदु दुरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलो होदी । णर तिरियेसु वि जीवा, पावंति ण दुक्ख-दोगच्चं।।३।। अर्थ: हे भगवान्! आपके इस विषहर मन्त्र की बात तो दूर रहे, मात्र आपको प्रणाम करना भी बहुत फल देने वाला होता है । उससे मनुष्य और तिर्यंच गतियों में रहने वाले जीव भी दुःख और दुर्गति को प्राप्त नहीं करते है । तुह सम्मत्ते लद्धे, चिंतामणि कप्पपायव सरिसे । पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ।।४।। अर्थ: वे व्यक्ति ...