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द्रव्य संग्रह प्राकृत - मूल पाठ -श्रीमद्‌-भगवन्नेमिचन्द्र-प्रणीत

द्रव्य संग्रह प्राकृत श्रीमद्‌-भगवन्नेमिचन्द्र-प्रणीत  मूल पाठ     मंगलाचरण जीवमजीवं दव्वं, जिणवरवसहेण जेण णिद्दिट्ठं देविंदविंदवंदं, वंदे तं सव्वदा सिरसा ॥1॥ जीवो उवओगमओ, अमुत्तिकत्ता सदेहपरिमाणो भोत्ता संसारत्थो, सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥2॥ तिक्काले चदुपाणा, इंदिय बलमाउ आणपाणो य ववहारा सो जीवो, णिच्चयणयदोदु चेदणाजस्स ॥3॥ उवओगो दुवियप्पो, दंसण णाणं च दंसणं चदुधा चक्खु अचक्खू ओही, दंसणमध केवलं णेयं ॥4॥ णाणं अट्ठवियप्पं, मदिसुदओही अणाणणाणाणी मणपज्जयकेवलमवि, पच्चक्ख परोक्खभेयं च ॥5॥ अट्ठचदुणाण दंसण, सामण्णं जीवलक्खणं भणियं ववहारा सुद्धणया, सुद्धं पुण दंसणं णाणं ॥6॥ वण्ण रस पंच गंधा, दो फासा अट्ठणिच्चया जीवे णो संति अमुत्ति तदो, ववहारा मुत्ति बंधादो ॥7॥ पुग्गलकम्मादीणं, कत्ता ववहारदो दु णिच्चयदो चेदणकम्माणादा, सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥8॥ ववहारा सुहदुक्खं, पुग्गलकम्मप्फलं पभुंजेदि आदा णिच्चयणयदो, चेदणभावं खु आदस्स ॥9॥ अणुगुरुदेह-पमाणो, उवसंहारप्पसप्पदो चेदा असमुहदो ववहारा, णिच्चयणयदोअसंखदेसो वा ॥10॥ पुढविजलतेउवाऊ, वणप्फदी विविहथावरेइंदी विगतिगचदुपंचक्ख...

प्रात: कालीन वंदना

  प्रात: कालीन वंदना सिद्ध शिला पर विराजमान अनंतान्त सिद्ध परमेष्ठी भगवानों को मेरा नमस्कार है। वृषभादिक महावीर पर्यन्त, उँगलियों के २४ पोरों पर विराजमान २४ तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार है।   सीमंधर आदि विद्यमान २० तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार है।  सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र को मेरा  बारम्बार  नमस्कार है ।  चारों दिशाओं, विदिशाओं में जितने भी अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधू, जिन-धर्म, जिन-आगम, व जितने भी कृत्रिम व अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालय हैं, उनको मन-वच-काय से मेरा  बारम्बार  नमस्कार है ।  ५  भरत,  ५  ऐरावत,  १०  क्षेत्र सम्बन्धी,  ३०  चौबीसी के ७२० जिनवरों को मेरा  बारम्बार  नमस्कार है । है भगवन! तीन लोक सम्बन्धी ८ करोड़ ५६ लाख ९७ हजार ४८१ अकृत्रिम जिन चैत्यालयों को मेरा नमन है। उन चैत्यालयों में स्थित ९२५ करोड़ ५३ लाख २७ हजार ९४८ जिन प्रतिमाओं की वंदना करती हूँ। \करता हूँ। हे भगवन! मैं यह भावना भाता हूँ कि मेरा आज का दिन अत्यंत मंगलमय हो। अगर आज मेरी मृत्यु भी आती है, तो मैं तनिक भी न घबराऊँ। मेरा...

प्रायश्चित पाठ

  दिन रात मेरे ...) शत शत प्रणाम करते, आशीष हमको देना। दोषों को दूर करने, अपराध क्षम्य करना॥1॥   मन से वचन से तन से, अ पराध पाप करते। कृत कारितानुमत से, दुख शोक क्लेश सहते॥2॥   चारों कषाय करके, निज रूप को भुलाया। आलस्य भाव करके, बहु जीव को सताया॥3॥   भोजन शयन गमन में, पापों का बंध बाँधा। अज्ञान भाव द्वारा, अज्ञात पाप बाँधा॥4॥   दिन रात और क्षण क्षण, अपराध हो रहे हैं। इस बोझ से दबे हम, पापों को ढो रहे हैं॥5॥   गुरुदेव की शरण में, प्रायश्चित लेने आये। मुक्ति का राज पाने, भव रोग को नशाए॥6॥ क्षमा प्रार्थना किया अपराध जो मैंने, तुम्हारे जाने अनजाने। क्षमा करना सभी मुझको, क्षमा करता सभी जन को॥   सभी से मित्रता मेरे, किसी से बैर ना क्षण को। यही है भावना मेरी, जिनेश्वर हो कृपा तेरी॥   किया उपयोग से छेदन, रहा हो भाव में वेदन। उन्हीं को त्यागता हूँ मैं, रहे जो भाव वह मुझमें॥   क्षमा करना क्षमा करना, ना दिल में रोष को धरना। शुद्ध दिल से माँगता हूँ, क्षमा भावों से झुकता हूँ॥  

दर्शन पाठ (हिंदी अनुवाद)

  दर्शन पाठ (हिंदी अनुवाद) दर्शन श्री देवाधिदेव का, दर्शन पाप विनाशन है। दर्शन है सोपान स्वर्ग का, और मोक्ष का साधन है।। श्री जिनेंद्र के दर्शन औ, निर्ग्रन्थ साधु के वंदन से। अधिक देर अघ नहीं रहै, जल छिद्र सहित कर में जैसे।। वीतराग मुख के दर्शन की, पद्मराग सम शांत प्रभा। जन्म-जन्म के पातक क्षण में, दर्शन से हों शांत विदा।। दर्शन श्री जिन देव सूर्य, संसार तिमिर का करता नाश। बोधि प्रदाता चित्त पद्म को, सकल अर्थ का करे प्रकाश।। दर्शन श्री जिनेंद्र चंद्र का, सदधर्मामृत बरसाता। जन्म दाह को करे शांत औ, सुख वारिधि को विकसाता।। सकल तत्व के प्रतिपादक, सम्यक्त्व आदि गुण के सागर। शांत दिगंबर रूप नमूँ, देवाधिदेव तुमको जिनवर।। चिदानंदमय एक रूप, वंदन जिनेंद्र परमात्मा को। हो प्रकाश परमात्म नित्य, मम नमस्कार सिद्धात्मा को।। अन्य शरण कोई न जगत में, तुम हीं शरण मुझको स्वामी। करुण भाव से रक्षा करिए, हे जिनेश अंतर्यामी।। रक्षक नहीं शरण कोई नहिं, तीन जगत में दुख त्राता। वीतराग प्रभु-सा न देव है, हुआ न होगा सुखदाता।। दिन दिन पाऊँ जिनवर भक्ति, जिनवर भक्ति जिनवर भक्ति। सदा मिले वह सदा...

गुरु स्तुति

  गुरु स्तुति ते गुरु मेरे उर बसो, जे भव जलधि जहाज। आप तिरैं पर तारहीं, ऐसे श्री ऋषिराज॥१॥ मोह महारिपु जानिकै, छांड्यो सब घर बार। होय दिगम्बर वन बसे, आतम शुद्ध विचार॥२॥ रोग उरग बिल वपु गिण्यो, भोग भुजङ्ग समान। कदली तरु संसार है, त्यागो सब यह जान ॥३॥ रतनत्रय निधि उर धरै, अरु निग्र्रन्थ त्रिकाल। मार्यो काम खबीस को, स्वामी परम दयाल॥४॥ पंच महाव्रत आचरै, पाँचों समिति समेत। तीन गुप्ति पालै सदा, अजर अमर पद हेत॥५॥ धर्म धरै दशलक्षणी, भावै भावना सार। सहैं परीषह बीस द्वै, चारित रतन भण्डार॥६॥ जेठ तपै रवि आकरो, सूखे सरवर नीर। शैल शिखर मुनि तप तपै, दाझै नगन शरीर॥७॥ पावस रैन डरावनी, बरसै जलधर धार। तरुतल निवसै साहसी, चालै झंझा बयार॥८॥ शीत पड़े कपि मद गले, दाहै सब वनराय। ताल तरंगनि के तटै, ठाड़े ध्यान लगाय॥९॥ इह विधि दुद्धर तप तपैं, तीनों काल मंझार। लागे सहज सरुप में, तन सो ममत निवार॥१०॥ पूरव भोग न चिन्तवें, आगम वांछा नाहिं। चहुँगति के दुख से डरैं, सुरति लगी शिवमाहिं॥११॥ रंग महल में पोढ़ते, कोमल सेज बिछाय। ते पश्चिम निशि भूमि में, सोवैं संवरि काय॥१२॥ गज चढि़ चलते गरब सो, सेना सजि चतुरङ्ग। निरखि निर...

योगिभक्ति संस्कृत आचार्य पूज्यपाद स्वामी कृत

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योगिभक्ति १ जाति-जरोरू-रोग-मरणतुर-शोक-सहस्र-दीपिता, दुःसह-नरक-पतन-संत्रस्त-धियः प्रतिबुद्ध-चेतसः। जीवितमम्बु-बिन्दु-चपलं तडिद्भ्रसमा विभूतयः, सकलमिदं विचिन्त्य मुनयः प्रशमाय वनान्तमाश्रिताः ॥१॥ भद्रिका व्रतसमितिगुप्तिसंयुताः शिवसुखमाधाय मनसि वीतमोहाः। ध्यानाध्ययनवशंगताः विशुद्धये कर्मणां तपश्चरन्ति ॥२॥ दुवई दिनकरकिरण-निकर-संतप्त-शिलानिचये षु   निःस्पृहाः, मलपट्टलाविलिप्त-तनवः शिथिलीकृत-कर्म-बन्धनाः। व्यपगत-मदन-दर्प-रति-दोष-कषाय-विरक्त-मत्सराः, गिरिशिखरेषु चण्डकरुणाभिमुखस्थितयो दिगम्बराः ॥३॥ भद्रिका सज्ज्ञानामृतपायिभिः शान्तिपथैः सिद्ध्यमानपुण्यकायैः, धृतसन्तोषच्छत्रकैरस्तापस्त्रीव्रोऽपि सह्यते मुनीन्द्रैः ॥४॥ दुवई शिखिगलितकज्जलालि-मलिनैर् विभुधाधिप-चापचित्रितैः, भीमर-वैरिवृष्ट-चण्डाशनि-शीतल-वायुवृष्टिभिः। गगन-तलं विलोक्य जलदैः स्थगितं सहसा तपोधनाः, पुनरपि तरुतलेषु विषमासु निशासु विश्राममासते ॥५॥ भद्रिका जल-धाराशतादिता न चलन्ति चरिताः सदा मुनिसिंहाः। संसार-दुःख-भीरवः परीषहाराति-घातिनः प्रवीराः ॥६॥ विषमजाति अविरतबहल-तुहिन-कण-वारिभिरुद्घट-पत्र-पातने- रनवरतमुक्तस्...

नवग्रह-शांति स्तोत्रम् (संस्कृत) || NAVGRAH SHANTI STOTRAM-आचार्य भद्रबाहु स्वामी

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नवग्रह-शांति स्तोत्रम् (संस्कृत) || NAVGRAH SHANTI STOTRAM आचार्य भद्रबाहु स्वामी जगद्गुरुं नमस्कृत्यं, श्रुत्वा सद्गुरुभाषितम् | ग्रहशांतिं प्रवचयामि, लोकानां सुखहेतवे || जिनेन्द्रा: खेचरा ज्ञेया, पूजनीया विधिक्रमात् | पुष्पै- र्विलेपनै – र्धूपै – र्नैवेद्यैस्तुष्टि – हेतवे || पद्मप्रभस्य मार्तण्डश्चंद्रश्चंद्रप्रभस्य च | वासुपूज्यस्य भूपुत्रो, बुधश्चाष्टजिनेशिनाम् || विमलानंत धर्मेश, शांति-कुंथु-अरह-नमि | वर्द्धमानजिनेन्द्राणां, पादपद्मं बुधो नमेत् || ऋषभाजितसुपाश्र्वा: साभिनंदनशीतलौ | सुमति: संभवस्वामी, श्रेयांसेषु बृहस्पति: || सुविधि: कथित: शुक्रे, सुव्रतश्च शनैश्चरे | नेमिनाथो भवेद्राहो: केतु: श्रीमल्लिपार्श्वयो: || जन्मलग्नं च राशिं च, यदि पीडयंति खेचरा: | तदा संपूजयेद् धीमान्-खेचरान् सह तान् जिनान् || आदित्य सोम मंगल, बुध गुरु शुक्रे शनि:। राहुकेतु मेरवाग्रे या, जिनपूजाविधायक:।। जिनान् नमोग्नतयो हि, ग्रहाणां तुष्टिहेतवे | नमस्कारशतं भक्त्या, जपेदष्टोतरं शतं || भद्रबाहुगुरुर्वाग्मी, पंचम: श्रुतकेवली | विद्याप्रसादत: पूर्ण ग्रहशांतिविधि: कृता || य: पठेत् प्रातर...

समाधि-भक्ति

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  समाधि-भक्ति तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे शिर पर हो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो   जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत-संयम चाहू ॥ गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥१॥ तेरी..   परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ। हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तौलूँ॥ आत्म-तत्त्व की रहे भावना, भाव विमल भर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो ॥2॥ तेरी..॥   जिनशासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोडूँ । निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोडूँ ॥ जन्म-जन्म में जैनधर्म, यह मिले कृपा कर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो॥3॥ तेरी..॥   मरण समय गुरु, पाद-मूल हो सन्त समूह रहे। जिनालयों में जिनवाणी की, गंगा नित्य बहे॥ भव-भव में संन्यास मरण हो, नाथ हाथ धर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो॥4॥ तेरी..॥   बाल्यकाल से अब तक मैंने, जो सेवा की हो। देना चाहो प्रभो! आप तो, बस इतना फल दो॥ श्वांस-श्वांस, अन्तिम श्वांसों में, णमोकार भर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो॥5॥ तेरी..॥   विषय...

पार्श्वनाथ स्तोत्र- कविश्री द्यानतराय जी

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  कविश्री द्यानतराय जी नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पूजें भजें नाय-शीशं | मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमों जोड़ि हाथं, नमो देव-देवं सदा पार्श्वनाथं ||१|| गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावे, महा-आग तें, नाग तें तू बचावे | महावीर तें युद्ध में तू जितावे, महा-रोग तें, बंध तें तू छुड़ावे ||२|| दु:खी-दु:ख-हर्ता, सुखी-सुक्ख-कर्ता, सदा सेवकों को महानंद-भर्ता | हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ||३|| दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने | महासंकटों से निकारे विधाता, सबे संपदा सर्व को देहि दाता ||४|| महाचोर को, वज्र को भय निवारे, महापौन के पुंज तें तू उबारे | महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ-शैलेश को वज्र मारा ||५|| महामोह-अंधेर को ज्ञान-भानं, महा-कर्म-कांतार को द्यौ प्रधानं | किये नाग-नागिन अधोलोक-स्वामी, हर्यो मान तू दैत्य को हो अकामी ||६|| तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य-चिंतामणी ना ग -एनं | पशू-नर्क के दु:ख तें तू छुड़ावे, महास्वर्ग  तें , मुक्ति में तू बसावे ||७|| करे लोह को हेम-पाषाण नामी, रटे नाम सो...

श्री नन्दीश्वर द्वीप (अष्टाह्निका पर्व) पूजन । Shree Nandishwar Dweep (Ashtahnika Parv) Pujan

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  श्री नन्दीश्वर द्वीप (अष्टाह्निका पर्व) पूजन । Shree Nandishwar Dweep (Ashtahnika Parv) Pujan सरब-परव में बड़ो अठाई परव है | नंदीश्वर सुर जाहिं लेय वसु दरब है || हमें सकति सो नाहिं इहाँ करि थापना | पूजें जिनगृह-प्रतिमा है हित आपना || ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) कंचन मणि मय भृंगार, तीरथ नीर भरा | तिहुँ धार दई निरवार, जामन मरन जरा || नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुंज करूं | वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं || ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्य: जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। भव तप हर शीतल वास, जो चंदन ना...