स्वयंभू स्त्रोता दोहाबली( आदिम तीर्थंकर प्रभो)- आचार्य भगवान श्री विद्यासागर जी महाराज कृत
आदिम तीर्थंकर प्रभो, आदिनाथ मुनिनाथ। आधि व्याधि अघ मद मिटे, तुम पद में मम माथ॥ शरण चरण हैं आपके, तारण तरण जहाज। भवदधि तट तक ले चलो,करुणाकर जिनराज ॥1॥ जित-इन्द्रिय जित-मद बने, जित-भवविजित-कषाय। अजित-नाथ को नित नमूँ, अर्जित दुरित पलाय॥ कोंपल पल-पल को पले, वन में ऋतु-पति आय। पुलकित मम जीवन-लता, मन में जिन पद पाय ॥2॥ तुम-पद-पंकज से प्रभो, झर-झर-झरी पराग। जब तक शिव-सुख ना मिले, पीऊँ षट प द जाग॥ भव-भव, भव-वन भ्रमित हो, भ्रमता-भ्रमता आज। संभव-जिन भव शिव मिले, पूर्ण हुआ मम काज ॥3॥ विषयों को विष लख तजूँ, बनकर विषयातीत। विषय बना ऋषि ईश को, गाऊँ उनका गीत॥ गुण धारे पर मद नहीं, मृदुतम हो नवनीत। अभिनन्दन जिन! नित नमूँ, मुनि बन मैं भवभीत ॥4॥ सुमतिनाथ प्रभु सुमति हो, मम मति है अति मंद। बोध कली खुल-खिल उठे, महक उठे मकरन्द॥ तुम जिन मेघ मयूर मैं, गरजो बरसो नाथ। चिर प्रतीक्षित हूँ खड़ा, ऊपर करके माथ ॥5॥ शुभ्र-सरल तुम, बाल तव, कुटिल कृष्ण-तम नाग। तव चिति चित्रित ज्ञेय से, किन्तु न उसमें दाग॥ विराग पद्मप्रभ आपके, दोनों पाद-सराग। रागी मम मन जा वहीं, पीता तभी पराग ॥6॥ ...